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महागठबंधन करेगा समीक्षा, जन सुराज हटाने को तैयार—शराबबंदी पर नई बहस

बिहार की राजनीति में शराबबंदी एक बार फिर बड़ा चुनावी मुद्दा बनकर उभर रही है। आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर विभिन्न दलों ने अपनी-अपनी रणनीति स्पष्ट करनी शुरू कर दी है। जहां एक ओर जन सुराज ने सत्ता में आने के कुछ ही मिनटों के भीतर शराबबंदी समाप्त करने का वादा किया है, वहीं महागठबंधन ने अपने घोषणापत्र में इस कानून की व्यापक समीक्षा करने और ताड़ी पर लगे प्रतिबंध को हटाने की बात कही है। दिलचस्प बात यह है कि इस मुद्दे पर सबसे ज्यादा सतर्क रुख जदयू का दिखाई देता है, जिसने अपने 32 पन्नों के घोषणापत्र में शराबबंदी पर कोई ठोस घोषणा नहीं की है, जबकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही इस कानून के सूत्रधार रहे हैं।

महागठबंधन का रुख

महागठबंधन ने अपने दस्तावेज़ में साफ संकेत दिया है कि यदि वह सत्ता में आता है तो शराबबंदी कानून की समीक्षा की जाएगी। विशेष रूप से ताड़ी व्यवसाय से जुड़े समुदायों की आजीविका पर पड़े असर को ध्यान में रखते हुए प्रतिबंध में ढील देने की बात कही गई है। दस्तावेज़ में यह भी उल्लेख है कि शराबबंदी कानून के उल्लंघन के कारण जेलों में बंद दलितों, अति पिछड़े वर्गों और गरीब तबकों को तत्काल राहत देने के उपाय किए जाएंगे।

इंडिया ब्लॉक के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने भी इस कानून से प्रभावित लोगों की आजीविका का मुद्दा उठाया है। उनका कहना है कि पीढ़ियों से ताड़ी के व्यवसाय से जुड़े समुदायों के सामने रोजगार का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले नौ वर्षों में बिहार मद्य निषेध कानून के तहत गिरफ्तार किए गए 12.79 लाख लोगों में से 85 प्रतिशत से अधिक अनुसूचित जाति, ईबीसी और ओबीसी वर्गों से आते हैं। विपक्ष का आरोप है कि यह तथ्य सत्ता पक्ष खुलकर सामने नहीं लाना चाहता।

शराबबंदी की पृष्ठभूमि

2015 के विधानसभा चुनावों में महागठबंधन ने भाजपा-नीत एनडीए को हराकर सत्ता हासिल की थी। लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार का दो दशक बाद साथ आना उस चुनाव की बड़ी राजनीतिक घटना थी। इसी कार्यकाल में 6 अप्रैल 2016 को बिहार विधानसभा ने पूर्ण शराबबंदी लागू करने के लिए संशोधित कानून पारित किया। बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद शुल्क अधिनियम को पेश करते हुए नीतीश कुमार ने महात्मा गांधी के विचारों का हवाला दिया और शराब को सामाजिक बुराई बताया।

हालांकि यह भी सच है कि 2005 में पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद नीतीश कुमार ने ही राज्य में उदार शराब नीति लागू की थी। गांव-गांव तक शराब की दुकानें खोली गईं, जिससे राज्य के आबकारी राजस्व में भारी वृद्धि हुई। 2005 में जहां यह राजस्व करीब 500 करोड़ रुपये था, वहीं 2015 तक यह बढ़कर 5,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया था। लेकिन 2015 के चुनाव में शराबबंदी का वादा जदयू के प्रमुख वादों में शामिल था, खासकर ग्रामीण महिलाओं की मांग को ध्यान में रखते हुए।

सामाजिक प्रभाव और विवाद

शराबबंदी ग्रामीण महिलाओं के बीच काफी लोकप्रिय रही। कई सामाजिक अध्ययनों में घरेलू हिंसा के मामलों में कमी का दावा किया गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, शराबबंदी लागू होने के बाद लाखों महिलाओं ने घरेलू हिंसा में कमी की बात कही। यह राज्य के सामाजिक ढांचे के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया।

इसके बावजूद, कानून के क्रियान्वयन को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं। अवैध शराब की तस्करी, जहरीली शराब की घटनाएं और पुलिस-प्रशासन की भूमिका पर आलोचना होती रही है। पिछले कुछ वर्षों में अवैध शराब से जुड़ी घटनाओं में 300 से अधिक लोगों की मौत हुई है। इन घटनाओं ने सरकार को बैकफुट पर ला दिया। बाद में सरकार ने पीड़ित परिवारों को 4 लाख रुपये मुआवजा देने की घोषणा की।

कानून में संशोधन और चुनौतियां

समय-समय पर सरकार ने कानून में कई संशोधन किए। पहली बार शराब पीने वालों के लिए गिरफ्तारी में ढील, सामुदायिक जुर्माना और घर की जब्ती जैसे प्रावधानों में बदलाव किए गए। 2021 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमना ने भी इस कानून में प्रशासनिक पारदर्शिता की कमी की ओर इशारा किया था।

राजनीतिक लाभ और नुकसान

शराबबंदी को लेकर जदयू को अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं मिला। 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू की सीटें घटकर 43 रह गईं, जो भाजपा की तुलना में लगभग आधी थीं। इसके बाद नीतीश कुमार ने कई बार राजनीतिक पाला बदला—महागठबंधन और एनडीए के बीच आना-जाना जारी रहा—लेकिन मुख्यमंत्री पद पर बने रहे। आज जदयू की राजनीतिक स्थिति काफी हद तक उसके सहयोगियों पर निर्भर मानी जाती है।

जन सुराज और प्रशांत किशोर का रुख

जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर इस मुद्दे पर सबसे मुखर हैं। उनका कहना है कि सत्ता में आने के 15 मिनट के भीतर शराबबंदी समाप्त कर दी जाएगी। उनका तर्क है कि शराबबंदी नैतिक रूप से सही हो सकती है, लेकिन व्यावहारिक रूप से यह विफल रही है और इससे लगभग 20,000 करोड़ रुपये की अवैध अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है।

सत्ता पक्ष की दलील

जदयू प्रवक्ताओं का कहना है कि शराबबंदी के सामाजिक लाभों से इनकार नहीं किया जा सकता। उनका दावा है कि महिलाओं और गरीब परिवारों के जीवन स्तर में सुधार हुआ है। हालांकि सीमित पुलिस बल और नेपाल सीमा की खुली स्थिति के कारण क्रियान्वयन में कठिनाइयां स्वीकार की गई हैं।

निष्कर्ष

बिहार में शराबबंदी अब सिर्फ सामाजिक नीति नहीं, बल्कि एक जटिल राजनीतिक मुद्दा बन चुकी है। एक ओर इसे महिला सशक्तिकरण और सामाजिक सुधार के प्रतीक के रूप में पेश किया जाता है, तो दूसरी ओर इसके आर्थिक और प्रशासनिक प्रभावों पर गंभीर सवाल उठाए जाते हैं। चुनावी माहौल में यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता किस तर्क को ज्यादा महत्व देती है—सामाजिक सुधार की दलील या आर्थिक व व्यावहारिक चुनौतियों की।

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