बिहार विधानसभा में सदन के माध्यम से राज्य सरकार का ध्यान एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील विषय की ओर आकृष्ट किया गया है। यह मुद्दा बिहार के उन हजारों संविदा फार्मासिस्टों से जुड़ा हुआ है, जो पिछले 10 से 15 वर्षों से राज्य के विभिन्न सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में निरंतर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूती में इन कर्मियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है, विशेषकर ग्रामीण और सुदूर क्षेत्रों में, जहां चिकित्सा संसाधनों की कमी के बावजूद इन्होंने अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ किया है।
सामान्य प्रशासन विभाग, बिहार सरकार द्वारा पत्र संख्या–12956, दिनांक 16.08.2024 के माध्यम से यह स्पष्ट निर्देश जारी किया गया था कि संविदा कर्मियों को नियमित नियुक्ति की प्रक्रिया में 25 अंकों की अधिमानता (वेटेज) प्रदान की जाएगी। इस आदेश का उद्देश्य उन कर्मियों को प्रोत्साहन और न्याय देना था, जो वर्षों से अस्थायी आधार पर कार्य करते हुए भी स्थायी कर्मचारियों के समान दायित्व निभा रहे हैं। यह निर्णय न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था, बल्कि इससे हजारों परिवारों को स्थायित्व और सम्मान मिलने की उम्मीद भी जगी थी।
हालांकि, अत्यंत खेद का विषय है कि बिहार तकनीकी सेवा आयोग (BTSC) द्वारा जारी फार्मासिस्ट भर्ती विज्ञापन संख्या 22/2025 में उक्त सरकारी आदेश का पालन नहीं किया गया है। इस विज्ञापन में संविदा फार्मासिस्टों को 25 अंकों की अधिमानता देने का कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं किया गया, जिससे वर्षों से सेवा दे रहे कर्मियों में गहरी निराशा और असंतोष की भावना उत्पन्न हुई है। यह स्थिति न केवल प्रशासनिक विसंगति को दर्शाती है, बल्कि उन कर्मियों के साथ अन्याय भी प्रतीत होती है जिन्होंने राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को निरंतर सशक्त बनाए रखने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
विशेष रूप से कोविड-19 जैसी आपदा के समय इन संविदा फार्मासिस्टों ने अग्रिम पंक्ति में रहकर अपनी जान जोखिम में डालते हुए जनता की सेवा की। सीमित संसाधनों और अनिश्चित भविष्य के बावजूद इन्होंने स्वास्थ्य तंत्र को सुचारू रूप से संचालित रखने में अहम योगदान दिया। इसके बावजूद यदि उन्हें नियमितीकरण और अधिमानता का लाभ नहीं मिलता है, तो यह उनके परिश्रम और समर्पण के साथ न्याय नहीं होगा।
उचित अधिमानता और नियमितीकरण की प्रक्रिया न होने के कारण इन कर्मचारियों का मनोबल लगातार गिर रहा है। आर्थिक असुरक्षा, भविष्य की अनिश्चितता और सामाजिक अस्थिरता ने उनके जीवन को प्रभावित किया है। कई कर्मी ऐसे हैं जो वर्षों से एक ही पद पर कार्यरत हैं, लेकिन उन्हें न तो वेतनमान में स्थिरता मिली है और न ही सेवा सुरक्षा। यह स्थिति राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है, क्योंकि असंतुष्ट और असुरक्षित कर्मचारी पूरी क्षमता से कार्य करने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं।
इसी संदर्भ में सदन के माध्यम से राज्य सरकार से मांग की गई है कि बिहार तकनीकी सेवा आयोग द्वारा जारी फार्मासिस्ट भर्ती प्रक्रिया में सामान्य प्रशासन विभाग के आदेश के अनुरूप 25 अंकों की अधिमानता तत्काल प्रभाव से लागू की जाए। साथ ही, जो संविदा फार्मासिस्ट पिछले कई वर्षों से निरंतर सेवा दे रहे हैं, उनके नियमितीकरण की ठोस और समयबद्ध प्रक्रिया शुरू की जाए, ताकि उन्हें स्थायी सेवा का अधिकार मिल सके।
यह केवल रोजगार या नियुक्ति का विषय नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों के सम्मान, सुरक्षा और भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। यदि सरकार संवेदनशीलता और न्यायसंगत दृष्टिकोण अपनाते हुए इस मुद्दे का समाधान करती है, तो इससे न केवल संविदा कर्मियों का विश्वास मजबूत होगा, बल्कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था भी अधिक सुदृढ़ और स्थायी बनेगी













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