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जमुई विधानसभा की वर्तमान राजनीतिक स्थिति: उम्मीदें, निराशा और नेतृत्व का सवाल

जमुई विधानसभा की वर्तमान राजनीतिक स्थिति: उम्मीदें, निराशा और नेतृत्व का सवाल

जमुई विधानसभा की राजनीति पिछले कुछ वर्षों में कई उतार-चढ़ाव से गुज़री है। कभी ऐसा समय था जब कुछ लोग फूल-माला और चादर लेकर जनता के बीच दौड़ते थे, छोटे-छोटे मंचों और यूट्यूब चैनलों पर खुद को बड़ा नेता साबित करने की कोशिश करते थे। जनता की भावनाओं को समझने और उनके मुद्दों को उठाने का दावा किया जाता था। लेकिन आज वही लोग हकीकत से दूर नजर आ रहे हैं। स्थिति यह है कि जिनके पास कभी भीड़ जुटती थी, आज उनकी बात सुनने वाला भी कोई नहीं है।

क्षेत्र में कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक रवैये को लेकर भी लोगों के बीच असंतोष देखा जा रहा है। कहीं दुकानों में लूट की घटनाएँ हो रही हैं, तो कहीं छोटे व्यापारियों के सामने बिना समुचित संवाद के बैरियर लगा दिए जाते हैं। कई लोग यह महसूस कर रहे हैं कि प्रशासन सख्ती दिखाने के नाम पर आम लोगों की समस्याओं को अनदेखा कर रहा है। ऐसे माहौल में जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा रहती है कि वे आगे बढ़कर जनता की आवाज बनें, लेकिन जब नेतृत्व कमजोर या निष्क्रिय प्रतीत होता है, तो जनता खुद को असहाय महसूस करती है।

राजनीति केवल पद या प्रचार का माध्यम नहीं होती, बल्कि यह सेवा और संघर्ष का मार्ग है। जमुई की जनता ने उन दिनों को भी देखा है जब दो समाजवादी राजनीतिक परिवारों ने वर्षों तक संघर्ष करते हुए बिना किसी भेदभाव के दलित बस्तियों में जाकर बैठकर उनकी समस्याएँ सुनीं। उन्होंने हर वर्ग—चाहे वह दलित हो, पिछड़ा हो, किसान हो या व्यापारी—सभी के साथ समान व्यवहार और सम्मान का रिश्ता बनाए रखा। जब भी किसी व्यापारी या आम नागरिक पर संकट आता था, वे बिना हिचक उसके साथ खड़े होते थे। यही कारण था कि राजनीति में उनके प्रति विश्वास और सम्मान बना रहा।

आज भले ही नरेंद्र बाबू का परिवार और जयप्रकाश नारायण यादव जी का परिवार सक्रिय राजनीति में पहले जैसी भूमिका में न दिखता हो, लेकिन उनके द्वारा स्थापित सेवा और संघर्ष की परंपरा लोगों की स्मृति में अब भी जीवित है। यही वजह है कि लगभग 15 वर्षों से औपचारिक राजनीति में सक्रिय न रहने के बावजूद, यदि कोई पीड़ित व्यक्ति अजय प्रताप जी को याद करता है, तो वे उसके साथ खड़े नजर आते हैं। यह दर्शाता है कि राजनीति केवल चुनाव जीतने या हारने तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह निरंतर जनसेवा की भावना से जुड़ी होती है।

जमुई विधानसभा की विडंबना यह भी है कि जिस व्यक्ति को जनता ने पांच वर्षों के कार्यकाल में नकार दिया था, उसे दोबारा बड़े बहुमत से विधानसभा भेज दिया गया—वह भी मुख्यतः प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम और प्रभाव पर। लोकतंत्र में जनता का निर्णय सर्वोपरि होता है, लेकिन जनप्रतिनिधि की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है। यदि जनता को अपने प्रतिनिधि से संवाद करने का अवसर न मिले, फोन तक न उठाया जाए, और न्याय के लिए पैरवी न की जाए, तो यह स्थिति चिंता का विषय बन जाती है।

जनप्रतिनिधि का कर्तव्य केवल सदन में बैठना नहीं, बल्कि अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं को सुनना, प्रशासन के सामने मजबूती से रखना और न्याय दिलाने के लिए संघर्ष करना होता है। यदि वह स्वयं को असमर्थ या व्यस्त बताकर दूरी बना ले, तो जनता के विश्वास को ठेस पहुँचती है।

आज जरूरत है कि जमुई की राजनीति फिर से सेवा, संवाद और संघर्ष की राह पर लौटे। नेताओं को चाहिए कि वे प्रचार से अधिक जनता के बीच समय बिताएँ, हर वर्ग के साथ संवाद स्थापित करें और प्रशासन व आम नागरिकों के बीच सेतु की भूमिका निभाएँ। लोकतंत्र में असली ताकत जनता की होती है, और जनता ही तय करती है कि कौन “घर का” है और कौन “घाट का”।

जमुई की जनता जागरूक है। वह विकास, सुरक्षा और सम्मान चाहती है—सिर्फ नारों और नामों के सहारे नहीं, बल्कि वास्तविक काम और जवाबदेही के आधार पर। आने वाला समय तय करेगा कि कौन नेतृत्व इस कसौटी पर खरा उतरता है और कौन नहीं।

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