माननीय गृह मंत्री जी
श्री सम्राट चौधरी जी
बिहार सरकार
सादर निवेदन है कि बिहार में कानून-व्यवस्था और “कानून के राज” को लेकर जो दावे किए जाते रहे हैं, वे हालिया घटनाक्रम के बाद गंभीर सवालों के घेरे में आ गए हैं। एक निर्वाचित सांसद, माननीय श्री पप्पू यादव जी, के साथ बिहार पुलिस द्वारा जिस प्रकार का व्यवहार किया गया, वह न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के विपरीत भी प्रतीत होता है।
माननीय मंत्री जी,
यह समझ से परे है कि 31 वर्ष पुराने एक मामले में कथित रूप से बेल की शर्त टूटने पर न तो कोई पूर्व सूचना दी गई, न कोई समन जारी हुआ और न ही कोई विधिवत नोटिस भेजा गया। इसके बावजूद माननीय सांसद को ऐसे गिरफ्तार किया गया, मानो वे कोई दुर्दांत अपराधी हों या न्याय से भाग रहे हों। क्या यही सुशासन है? क्या यही वह “ना फंसाते हैं, ना बचाते हैं” की नीति है, जिसका उल्लेख सरकार बार-बार करती है?
यह तथ्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण है कि सांसद महोदय लोकसभा की कार्यवाही के उपरांत स्वयं न्यायालय में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने आए थे। ऐसी स्थिति में रात के लगभग 1 बजे गिरफ्तारी की असामान्य जल्दबाजी क्यों दिखाई गई? किस विधिक प्रावधान के अंतर्गत आधी रात को इस प्रकार की कार्रवाई आवश्यक समझी गई? क्या यह प्रक्रिया न्याय के सिद्धांतों और मानवीय गरिमा के अनुरूप कही जा सकती है?
माननीय मंत्री जी,
आपका और सांसद महोदय का पारिवारिक तथा राजनीतिक संबंधों का इतिहास किसी से छिपा नहीं है। आपके पूज्य पिताजी, आदरणीय शकुनी चौधरी जी, के साथ सांसद महोदय ने राजनीति में कार्य किया। आपकी माताजी का भी उन्हें पुत्रवत स्नेह प्राप्त रहा है। ऐसे में आज जब उन्हीं के साथ कथित रूप से अन्याय हो रहा है, तो आपका मौन आम जनता को गहरी पीड़ा और निराशा से भर देता है। लोग यह अपेक्षा करते हैं कि ऐसे समय में आप निष्पक्षता और संवैधानिक दायित्व का परिचय देंगे।
इस पूरे घटनाक्रम में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक श्री कार्तिकेय शर्मा की भूमिका पर भी गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें माननीय सांसद महोदय से ऐसी क्या परेशानी है कि बार-बार कानून की सीमाओं को लांघते हुए उनके विरुद्ध कार्रवाई की जाती है। जबकि सांसद महोदय का उनसे न तो कोई व्यक्तिगत विवाद है और न ही किसी प्रकार की शत्रुता।
इसके बावजूद, लॉरेंस विश्नोई धमकी प्रकरण के दौरान, पूर्णिया में एसपी रहते हुए, श्री कार्तिकेय शर्मा पर यह आरोप लगा कि आरा के एक युवक से जबरन सांसद महोदय के विरुद्ध बयान दिलवाया गया और बाद में उस युवक ने स्वयं स्वीकार किया कि पूरी कहानी पुलिस दबाव में गढ़ी गई थी। उस समय भी सांसद महोदय ने पुलिसिंग के तौर-तरीकों पर प्रश्न उठाते हुए विशेषाधिकार प्रस्ताव दिया था। दुर्भाग्यवश, अब एक बार फिर बेल से संबंधित मामले में वही प्रवृत्ति दोहराई गई प्रतीत होती है।
मंत्री जी,
रात के अंधेरे में सेल के एक इंस्पेक्टर को सिविल ड्रेस और हथियार के साथ सांसद महोदय के आवास पर भेजा जाना भी अत्यंत चिंताजनक है। यह कदम ऐसा प्रतीत कराता है मानो सांसद महोदय फरार हों या किसी गंभीर अपराध की योजना बना रहे हों। जबकि वे सार्वजनिक जीवन में रहने वाले, सदैव कानून और व्यवस्था के पक्ष में खड़े रहने वाले जनप्रतिनिधि हैं।
इन परिस्थितियों में कुछ प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठते हैं—
क्या बिहार में अब सच बोलना अपराध बनता जा रहा है?
क्या जनता की आवाज़ उठाना पुलिस की दृष्टि में दोष माना जाने लगा है?
क्या एक निर्वाचित सांसद के साथ इस प्रकार का व्यवहार कर सरकार लोकतंत्र को कमजोर नहीं कर रही?
माननीय सम्राट चौधरी जी,
आपसे अपेक्षा है कि आप इस पूरे मामले का निष्पक्ष संज्ञान लें, पुलिस कार्रवाई की समीक्षा कराएं और यह सुनिश्चित करें कि बिहार में कानून सभी के लिए समान रूप से लागू हो। जो आज माननीय सांसद के साथ हुआ है, क्या वह न्याय, सुशासन और लोकतंत्र की कसौटी पर सही ठहरता है—इसका उत्तर प्रदेश की नहीं, बल्कि बिहार की जनता जानना चाहती है।
सादर
निजी सचिव
दिल्ली कार्यालय













Leave a Reply