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सिकंदर और डायोजनीज: विजय बनाम विश्राम की कथा

सिकंदर और डायोजनीज: विजय बनाम विश्राम की कथा

इतिहास के पन्नों में एक अत्यंत रोचक प्रसंग मिलता है—विश्वविजेता माने जाने वाले Alexander the Great और यूनानी दार्शनिक Diogenes of Sinope की मुलाकात का।

कहा जाता है कि जब सिकंदर अपनी विजयों की यात्रा पर निकला था और पूर्व की ओर बढ़ते हुए भारत की दिशा में अग्रसर था, तब रास्ते में उसे बताया गया कि एक विलक्षण फकीर है—डायोजनीज। वह किसी नगर के बाहरी हिस्से में रहता है, वस्त्रहीन, निस्संग, संसार की परवाह किए बिना। जो उसे देख ले, वह भीतर तक हिल जाए।

सिकंदर ने सोचा—ऐसे व्यक्ति से मिलना चाहिए।

सुबह का समय था। हल्की ठंड थी। खुला आकाश, कोमल धूप धरती पर उतर रही थी। डायोजनीज नग्न अवस्था में धूप सेंक रहा था। उसके पास न सिंहासन था, न सेना, न छत्र—बस खुला आकाश और स्वतंत्रता।

उसी समय सिकंदर अपने सैनिकों और शान-ओ-शौकत के साथ वहां पहुँचा। वह उसके सामने खड़ा हो गया। अनजाने में उसकी छाया डायोजनीज पर पड़ने लगी और धूप रुक गई।

सिकंदर ने गर्व से कहा,
“शायद आप मुझे नहीं जानते। मैं हूं महान सिकंदर।”

डायोजनीज हँसा। ज़ोर से हँसा। फिर अपने पास बैठे कुत्ते को पुकार कर बोला,
“सुनो, यह आदमी कहता है कि यह स्वयं महान है। कुत्ते भी अपने मुँह से खुद को महान नहीं कहते।”

इतनी निर्भीकता! सामने विश्वविजेता खड़ा है—और एक नग्न फकीर उसका उपहास कर रहा है।

क्षणभर को सिकंदर का हाथ तलवार पर गया। यह उसका स्वभाव था—अवज्ञा का उत्तर शक्ति से देना। पर डायोजनीज शांत स्वर में बोला:

“तलवार वहीं रहने दो। तलवार उन लोगों के लिए होती है जो मरने से डरते हैं। मैं तो पहले ही उन इच्छाओं को त्याग चुका हूँ जिनसे मृत्यु जन्म लेती है। जिसके सपने मर गए, वह स्वयं मृत्यु से परे हो जाता है।”

ये शब्द तलवार से अधिक धारदार थे। सिकंदर का हाथ ढीला पड़ गया।

उसने स्वर बदला और पूछा,
“फिर भी, मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ?”

डायोजनीज ने बिना उठे उत्तर दिया,
“हाँ, एक काम कर सकते हो। थोड़ा हट जाओ। मेरी धूप में आड़ मत बनो। और जीवन में भी किसी की धूप मत छीनना।”

सिकंदर पहली बार निरुत्तर हुआ। उसने कहा,
“मैं जा रहा हूँ। पर आज पहली बार मुझे लगा कि मैं किसी के सामने छोटा पड़ गया। यदि फिर जन्म मिला तो मैं सिकंदर नहीं, तुम्हारे जैसा बनना चाहूँगा।”

डायोजनीज मुस्कुराया।
“और यदि ईश्वर मुझसे कहे कि सिकंदर बन जाओ, तो मैं कहूँगा—पागल हूँ क्या? जो स्वयं को महान सिद्ध करने में लगा हो, वह भीतर से कितना असुरक्षित होगा!”

फिर उसने प्रश्न किया,
“इतनी दौड़-भाग, इतनी सेना लेकर कहाँ जा रहे हो?”

सिकंदर के चेहरे पर चमक आ गई।
“दुनिया जीतने जा रहा हूँ!”

“फिर?”

“भारत जीतूँगा।”

“फिर?”

“चीन।”

“फिर?”

“सारी दुनिया।”

डायोजनीज ने आखिरी प्रश्न पूछा,
“और उसके बाद?”

सिकंदर ठिठका।
“फिर… फिर आराम करूँगा।”

डायोजनीज फिर हँसा।
“यह कैसा पागलपन है! हम बिना दुनिया जीते आराम कर रहे हैं। मेरा कुत्ता भी आराम कर रहा है। और तुम कहते हो, पहले दुनिया जीतूँगा, फिर आराम करूँगा? आराम करना ही है तो अभी क्यों नहीं?”

उसने सहज भाव से कहा,
“मेरी झोपड़ी में जगह है। दो लोग आराम से रह सकते हैं। अमीर के महल में एक भी चैन से नहीं रह पाता। महल बढ़ते जाते हैं, असंतोष भी बढ़ता जाता है। पर गरीब की झोपड़ी बड़ी होती है—क्योंकि उसमें इच्छाएँ नहीं रहतीं।”

सिकंदर प्रभावित हुआ, पर बोला,
“अब आधी यात्रा कर चुका हूँ। लौटना कठिन है। जल्दी ही लौटूँगा।”

डायोजनीज गंभीर हुआ।
“मैंने बहुतों को यात्राओं पर जाते देखा है। कोई लौटकर नहीं आता। जब तक होश आता है, तब तक जीवन समाप्त हो जाता है। गलत रास्ते से लौटने में ही बुद्धिमानी है—चाहे आधा रास्ता तय कर लिया हो।”

उसने उदाहरण दिए—
“यदि कोई कुएँ की ओर जा रहा हो और कोई उसे चेताए, तो क्या वह कहेगा कि आधा रास्ता आ चुका हूँ, अब नहीं लौट सकता? या यदि अँधेरे में साँप हो, तो क्या दस कदम चल लेने के बाद भी वह आगे ही बढ़ेगा?”

फिर वह बोला,
“सपने बड़े होते हैं, जीवन छोटा। जीवन समाप्त हो जाता है, सपने अधूरे रह जाते हैं। फिर भी तुम जाओ। मेरा घर खुला है। कोई दरवाज़ा नहीं। मैं रहूँ या न रहूँ, तुम कभी भी आ सकते हो।”

इतिहास कहता है कि सिकंदर भारत से लौटते समय ही मृत्यु को प्राप्त हुआ। वह सारी दुनिया जीतने निकला था—पर स्वयं को नहीं जीत पाया।

सत्य यही है—अंधी यात्राएँ कभी पूरी नहीं होतीं, यात्री समाप्त हो जाता है।

मनुष्य बार-बार वही दौड़ लगाता है—यश, पद, सत्ता, अहंकार, प्रतिस्पर्धा। यदि उसे याद आ जाए कि यह सब वह पहले भी कर चुका है, तो शायद उसी क्षण रुक जाए। शायद इसलिए प्रकृति हमें पिछली भूलें भुला देती है—ताकि हम फिर वही चक्र दोहरा सकें।

लेकिन जो जाग जाता है, वह समझ लेता है—
आराम मंज़िल नहीं, अवस्था है।
विजय बाहर नहीं, भीतर है।
और धूप हमेशा से उपलब्ध थी—हम ही किसी की छाया में खड़े थे।

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