सिलीगुड़ी सम्मेलन में प्रोटोकॉल विवाद: ममता सरकार के रवैये पर राष्ट्रपति मुर्मु नाराज़, पीएम मोदी और अमित शाह ने जताई कड़ी आपत्ति
पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में आयोजित नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन के दौरान एक ऐसा विवाद खड़ा हो गया है जिसने राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस को जन्म दे दिया है। इस कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचीं भारत की राष्ट्रपति Droupadi Murmu ने राज्य सरकार के व्यवहार पर खुलकर नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा कि सम्मेलन में शामिल होने के लिए आने वाले आदिवासी समुदाय के लोगों को रास्ते में रोका गया और राज्य सरकार की ओर से कोई प्रतिनिधि उनका स्वागत करने के लिए मौजूद नहीं था।
राष्ट्रपति के इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल गर्म हो गया। प्रधानमंत्री Narendra Modi और केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने भी इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए पश्चिम बंगाल की सरकार की तीखी आलोचना की है।
राष्ट्रपति ने जताई नाराजगी
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु शनिवार को सिलीगुड़ी में आयोजित नौवें अंतरराष्ट्रीय संथाल सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुई थीं। इस दौरान उन्होंने मंच से ही अपने संबोधन में कहा कि कार्यक्रम के आयोजन के दौरान कई ऐसी बातें सामने आईं, जो बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं।
उन्होंने बताया कि सम्मेलन में भाग लेने के लिए आने वाले आदिवासी समाज के लोगों को रास्ते में रोक दिया गया, जिससे वे कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार की ओर से उनका स्वागत करने के लिए कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं था, जो परंपरागत प्रोटोकॉल के विपरीत है।
अपने संबोधन के दौरान उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee का जिक्र करते हुए कहा कि वह उन्हें अपनी छोटी बहन की तरह मानती हैं, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि मुख्यमंत्री उनसे काफी नाराज हैं।
राष्ट्रपति ने इस अवसर पर आदिवासी समाज की स्थिति पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड और ओडिशा जैसे राज्यों में आदिवासी समुदाय की बड़ी आबादी रहती है, लेकिन इसके बावजूद यह समाज अब भी कई मामलों में पिछड़ा हुआ है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आदिवासी समाज के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास के लिए सभी सरकारों को मिलकर गंभीर प्रयास करने चाहिए।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा – यह शर्मनाक
इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक बताया। उन्होंने कहा कि भारत के राष्ट्रपति के कार्यक्रम में इस तरह की अव्यवस्था पहले कभी देखने को नहीं मिली।
प्रधानमंत्री ने कहा कि जो भी लोग लोकतंत्र और आदिवासी समुदायों के सशक्तिकरण में विश्वास रखते हैं, वे इस घटना से निराश हैं। उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु स्वयं आदिवासी समुदाय से आती हैं और उन्होंने जो पीड़ा और दुख व्यक्त किया है, उससे देश के करोड़ों लोगों का मन आहत हुआ है।
पीएम मोदी ने आगे कहा कि पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार ने इस मामले में सारी सीमाएं पार कर दी हैं। उनके अनुसार राष्ट्रपति के कार्यक्रम में हुई अव्यवस्था और प्रोटोकॉल की अनदेखी के लिए राज्य प्रशासन पूरी तरह जिम्मेदार है।
उन्होंने यह भी कहा कि संथाल संस्कृति जैसे महत्वपूर्ण विषय से जुड़े कार्यक्रम के प्रति राज्य सरकार का इस तरह का लापरवाह रवैया बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रधानमंत्री ने जोर देकर कहा कि राष्ट्रपति का पद राजनीति से ऊपर होता है और इस पद की गरिमा तथा पवित्रता का सम्मान हर परिस्थिति में किया जाना चाहिए।
अमित शाह का भी कड़ा बयान
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस मामले को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस सरकार अपने अराजक व्यवहार के कारण लगातार गिरते स्तर का परिचय दे रही है।
अमित शाह ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने प्रोटोकॉल की पूरी तरह अनदेखी करते हुए देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद का अपमान किया है। उन्होंने कहा कि यह घटना राज्य सरकार की कार्यशैली और उसकी सोच को उजागर करती है।
गृह मंत्री ने आगे कहा कि जो सरकार अपने नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी करती है, वह देश के राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पद का भी सम्मान नहीं कर पाती। उनके अनुसार यह केवल राष्ट्रपति का ही नहीं, बल्कि देश के लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान का भी अपमान है।
अमित शाह ने विशेष रूप से इस बात पर दुख जताया कि आदिवासी समाज द्वारा आयोजित एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में इस तरह की स्थिति पैदा हुई। उन्होंने कहा कि इससे पूरे देश में निराशा और आक्रोश की भावना है।
राजनीतिक बहस तेज
इस घटना के बाद राष्ट्रीय राजनीति में बहस और आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। एक तरफ केंद्र सरकार के शीर्ष नेताओं ने इसे गंभीर प्रोटोकॉल उल्लंघन बताया है, वहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह मुद्दा केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार के बीच राजनीतिक टकराव को और तेज कर सकता है।
फिलहाल इस पूरे विवाद ने आदिवासी समाज, संवैधानिक पदों की गरिमा और केंद्र-राज्य संबंधों को लेकर एक नई चर्चा को जन्म दे दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मामले पर पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से क्या प्रतिक्रिया सामने आती है और यह विवाद आगे किस दिशा में बढ़ता है।













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